एहसाँसों का समंदर by Lakshmi Singh View larger

Ehsason ka somundar (एहसाँसों का समंदर) by Lakshmi Singh (लक्ष्मी सिंह)

ISBN: 978-93-86074-24-9

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मेरे मन में कुछ अनुभूतियाँ उपजती है, जो शब्दों का रूप ले लेती है

कभी प्रेम की उत्पत्ति होती है, तो कभी गहरा दुख उपजता है

कभी आनंद की अनुभूति होती है, तो कभी विक्षोभ उपजती है

उन्हीं अनुभूतियों को कोरे कागज पर समेटती रहती हूँ मैं लिखती हूँ

मेरे आत्मा में कुछ भाव टूटते हैं, जो मेरे मन मस्तिष्क को छूते हैं

कुछ उथल-पुथल सा होता है, मुझे अन्दर तक झकझोरता है

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Data sheet

Binding TypePerfect Binding (Soft cover)
LanguageHindi
Interior ColorFull black and white interior
Book TypePhysical

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मै लक्ष्मी सिंह झारखंड राज्य से संबंध रखती हूँ। मेरे पिता श्री राम नारायण सिंह जी और मेरी माता श्रीमती शांति देवी हैं जिन्होंने मुझे इस लायक बनाया। मैंने  संस्कृत में MA (BEd ) तक की शिक्षा प्राप्त की है। मेरा जन्म बिहार में बेगूसराय जिले के मेहा ग्राम में यानि मेरे ननिहाल में हुआ। बचपन से मुझे पढ़ने लिखने का बहुत शौक़ था। मेरी शिक्षा झारखण्ड के deoghar जिला में संपन्न  हुई है ।वर्तमान समय में  मेरा  दिल्ली में मेरा निवास स्थान है । मैं अपने ब्लॉग दर्पण और sahityapedia website पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करती हूँ। मेरी रचनाएँ  कई प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत भी हुई हैं। यह मेरी प्रथम पुस्तक है। 

मेरे मन में कुछ अनुभूतियाँ उपजती है,

जो शब्दों का रूप ले लेती है,

कभी प्रेम की उत्पत्ति होती है,

तो कभी गहरा दुख उपजता है,

कभी आनंद की अनुभूति होती है,

तो कभी विक्षोभ उपजती है,

उन्हीं अनुभूतियों को कोरे कागज पर

समेटती रहती हूँ मैं लिखती हूँ।

मेरे आत्मा में कुछ भाव टूटते हैं,

जो मेरे मन मस्तिष्क को छूते हैं,

कुछ उथल-पुथल सा होता है,

मुझे अन्दर तक झकझोरता है,

फिर शब्द निर्झर बन फूटता है,

कोरे कागज पर गिरता है,

फिर मेरा मन कुछ लिखता है,

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Ehsason ka somundar (एहसाँसों का समंदर) by Lakshmi Singh (लक्ष्मी सिंह)

Ehsason ka somundar (एहसाँसों का समंदर) by Lakshmi Singh (लक्ष्मी सिंह)

मेरे मन में कुछ अनुभूतियाँ उपजती है, जो शब्दों का रूप ले लेती है

कभी प्रेम की उत्पत्ति होती है, तो कभी गहरा दुख उपजता है

कभी आनंद की अनुभूति होती है, तो कभी विक्षोभ उपजती है

उन्हीं अनुभूतियों को कोरे कागज पर समेटती रहती हूँ मैं लिखती हूँ

मेरे आत्मा में कुछ भाव टूटते हैं, जो मेरे मन मस्तिष्क को छूते हैं

कुछ उथल-पुथल सा होता है, मुझे अन्दर तक झकझोरता है